भारतीय फिल्मो में इतिहास से लेकर आज वर्तमान तक अदभुत परिवर्तन हुआ है जहाँ कभी पहले पूरे परिवार के साथ किसी फिल्म का आनंद लिया जाता था आज वही किसी फिल्म को पूरे परिवार के साथ देखना दुर्लभ हो गया है!!
आज व्यक्ति इस फूहड़ता को अपने जीवन की जरुरत समझ बैठा जो की उसकी एक बड़ी भूल है तथा भारतीय संस्कृति के लिए यह बहुत ही शर्मनाक बात है जिस तरह भोजन करते समय सब्जी के बिना रोटी खाने का आनंद अधूरा होता है उसी तरह आज की फिल्मे भी फूहड़ता के बिना अधूरी मानी जाती है समाज में उपजी ये गलत मानसिकता बहुत ही तर्क हीन है! आज फिल्मे व्यंगात्मक हो चाहे सामाजिक विचारों पर आधारित लेकिन उसमे फूहड़ता जरुरी हो गई है समाज को दिशा,ज्ञान और निर्देश देने वाली फिल्मे आज फूहड़ता तक ही सिमट कर रह गई है!!आज नेता हो या अभिनेता फ़िल्मी अंदाज़ में ही बात करता है फिल्मो का समाज पर इतना असर हुआ है की वह आज फ़िल्मी मानसिकता के बाहर काम करना ही पसंद नहीं करता है आज जरुरत है की जागरूकता पूर्ण तथा ज्ञान वर्धक फिल्मो का समाज में अर्जन हो जिस से समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़े ना की अश्लीलता दिखकर नकारात्मक मानसिकता का विकास!
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